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Thursday, August 31, 2017

शिक्षा करती है सुना सामाजिक कल्याण ............ कहानी --पूनम माटिया


शिक्षा करती है सुना , सामाजिक कल्याण
कन्या फिर भी मर रहीं ,बचते नाही प्राण ..........पूनम माटिया 
पढ़िए मेरी कहानी ......अक्षर शिल्पी में 


Thursday, July 20, 2017

गीत-कब आओगे साजन?



आकर तुम मत जाना साजन,
आकर तुम मत जाना ...

जब आँगन में मेघ निरंतर झर-झर बरस रहे हों
ऐसे में दो विकल हृदय मिलने को तरस रहे हों
जब जल-थल सब एक हुए हों, धरती-अम्बर एकम
शोर मचाता पवन चले जब छेड़-छेड़ कर हर दम
ऐसे में तुम आना साजन! ऐसे में तुम आना
आकर तुम मत जाना साजन..........

कंपित हो जब देह, नेह की आशा लेकर आना
प्रेम-मेंह की एक नवल परिभाषा लेकर आना
लहरों से अठखेली करता चाँद कभी देखा है?
या आतुर लहरों का उठता नाद कभी देखा है?
चंदा बन के आना साजन! चंदा बन के आना
आकर तुम मत जाना साजन..........

पल-प्रतिपल आकुल-व्याकुल मन, राह निहारे हारा
तुम आये, ना पत्र मिला, ना कोई पता तुम्हारा
फागुन बीता, बीत गया आषाढ़ कि आया सावन
कब आओगे, कब आओगे, कब आओगे साजन?
आकर तुम मत जाना साजन...........


...........पूनम माटिया

Tuesday, May 16, 2017

शोचनीय .........



किसी भी बर्तन की तरह ख़ुद को भीतर से मांजना अधिक पड़ता है ........... क्योंकि पात्र में वस्तु अन्दर ही परोसी जाती है .......पुन: -पुन: उपयोग करने के लिए उसकी सफाई भीतर ही अधिक आवश्यक है .......... थोड़े कहे को बहुत समझिये .........ऐसा मेरे बाबा /दादा कहते थे .......... पूनम माटिया 

Tuesday, April 11, 2017

गीत -राम मेरे...

राम मिले सीता को जैसे , मुझको भी तुम मिल जाओ 
तोड़ धनुष को वरण करो तुम, राम मेरे तुम बन आओ
नहीं मांगती बंगला गाडी, नहीं मांगती मैं सोना 
कुछ छोटे-छोटे सपने हैं, आकर पूरे कर जाओ............................ राम मेरे तुम बन आओ
युग-युग से प्यासी है धरती, आकर अगन बुझा जाओ 
घट-घट बैठी कोटि अहिल्या, आकर उन्हें जिला जाओ.........................राम मेरे तुम बन आओ

दुर्योधन
, दशग्रीव बने सब , नारी हाहाकार करे मर्यादा पुरुषोत्तम हो तुम, आकर पाठ पढ़ा जाओ....................     ......राम मेरे तुम बन आओ

साधू-संत सियाने जितने
, सब माया के लोभी हैं बच न सकी सोने की लंका, त्रेता याद दिला जाओ ..........................राम मेरे तुम बन आओ
.........................पूनम माटिया 

Sunday, April 9, 2017


जाम था, तिश्र्नगी रही फिर भी
वस्ल था,
बेकली रही फिर भी

ज़िन्दगी ज़िन्दगी न थी यूँ तो
शान से वो तनी रही फिर भी

ज़िन्दगी से बहुत निबाह किया
ज़िन्दगी अजनबी रही फिर भी

तेरा आना   था  ज़रूरी,पर
आस दिल में बँधी रही फिर भी
                      
यूँ तो सब आस-पास  थे  मेरे
तेरे बिन कुछ कमी रही फिर भी

लाख चाहा न डगमगाएं हम
रात दिन बेख़ुदी रही फिर भी

ढक लिया चाँद अब्र ने तो क्या
रात ‘पूनम’ की ही रही फिर भी                    ........ पूनम माटिया 

Monday, March 6, 2017

ग़ज़ल



उफ़्फ़! कितना बदल गई हूँ मैं
शम्अ  जैसे  पिघल गई हूँ मैं


क्या यही मैं थी, क्या वही मैं हूँ
किसके  पैकर में  ढल गई हूँ मैं


अब कहाँ शोख़ियाँ वो बचपन की
कितना  आगे  निकल  गई  हूँ  मैं

दर्द  ज़ाहिर  नहीं  किया  करती
वाक़ई  अब   सँभल  गई  हूँ  मैं

अब क़सीदे न भी पढ़े कोई
ख़ुद ही 'पूनम' बहल गई हूँ मैं

मैं तो 'पूनम' हूँ, चाँदनी शब हूँ
फिर भी क्यूँ तुमको खल गई हूँ मैं

.........पूनम माटिया

Friday, February 17, 2017

ख़ामोश गवाह .......


वो इक टूटा-फूटा, उजड़ा मकान है
दरवाज़े हैं, खिड़कियाँ हैं, साँकल भी है पुरानी-सी
बहुत-से ताले नहीं , इतने बड़े मकान में
अब केवल एक ताला है
फ़र्श है पत्थरों के टुकड़ों में
पैंडा भी है , कुठियार भी
जाल भी है , जाले भी हैं बहुत
छत भी होगी ही कमरों के ऊपर
कमरों के भीतर कुछ बर्तन भी होंगे शायद
कुछ मिटटी के मटके , कुछ दरके हुए संदूक भी
शायद निशानियाँ अब भी हों हमारे बचपन की|
हाँ, वो रंग-बिरंगे खनकते हुए कांच के कंचे, जो
नानी मुझे नहीं केवल भाई को देती थी
लाड़ लड़ाती थी, मांजे से भरी चरखड़ी भी रखती थी
छुपाके रखती थी बहुत कुछ
हाँ
, शायद अब भी हों  .......
ये
शायद बड़ा खटक रहा है मुझे आज|
आज! जब खंडहर-में तब्दील इस मकान में मेरी निग़ाहें
खोज रहीं हैं घर!

खोज रहीं हैं उस पैंडे पर
बड़ी मेहनत से लायीं पानी से भरी टोक्नियाँ

गूँज रही है इक आवाज़, ‘न गंदे-संदे हाथ नहीं लगइयो छोरी
भीतर कुछ उथल-पुथल है, मानो कुछ टूट रहा है, बिखर रहा है ...
फिर नज़र पहुंची उस टूटे जाल से दिखते रसोड़े के किवाड़ के पीछे
अब भी चुल्हा जल रहा हो जैसे.......

अब भी तवे पे पका रही हों रोटियाँ
वो छोटी-सी कद-काठी वाली, कमर झुकाके चलने वाली,
चश्मे के गोलाकार शीशों को बार-बार आँखों पे टिकाती,
सूखे होठों पे जीभ फेरती मेरी नानी |

सबके बाद ही खाऊँगी, पहले बालक खालें
भूखी
-प्यासी पर संतुष्ट मेरी नानी!
नूनी घी में सारा दुलार उड़ेल देने वाली,
चुपके से दिल्ली वापस आते हुए मुठ्ठी में कुछ पैसे

भींच देती अपने पल्लू में बंधी गाँठ खोल के ....
आज फिर मेरी ऑंखें खोज रही हैं

वो सूती-साड़ी, सर पे पल्लू संवारती मेरी नानी


पीतल की डोलची में पानी और डोलची में कुलिया
प्रतिदिन सुबह शिवाले में बुदबुदाती हुई,

एक आरती पूरी कर जल चढ़ाती हुई, पीपल-बड़ को पूजती, परिक्रमा करती
मैं चिच्ची ऊँगली थामे साथ-साथ चक्कर लगाती, टूटे-फूटे अक्षर दोहराती
देख रही हूँ सब ...............अब चित्रवत!
अचानक फिर यादों की चिटकनी खुली, तन्द्रा टूटी
फिर शिवाले से रसोड़े में .. रे मैना
, दूध पिवाहा कर बालका ने
यहाँ-वहाँ हर जगह नानी, और उनकी सुंदर प्रतिलिपि-मेरी माँ
काँधे पे घुमाते, बाज़ार घुमाते, किस्से-कहानी सुनाते मामा...

‘चाय तैयार है’- तभी पड़ोस से आई आवाज़
खुली आँखें नींद से जगीं  

घर! जिसके कोने-कोने में दिखने लगा था जीवन
वापस खंडहर में तब्दील
मकान हो गया
मैं ही नहीं, कई जोड़े आँखें जो शायद अपना बचपन खोज रही थीं  
जाग गयीं .......और जान गयीं
‘कई अपने’ अब नहीं हैं जिनके होने से ये मकान घर था

और जान गए कि पत्थरों की उम्र इंसान से ज्यादह होती है
कम से कम खंडहर तो हैं ........ख़ामोश हैं
खड़े-खड़े गवाही दे रहे हैं- कभी आबाद थे हम भी
|

.........डॉ. पूनम माटिया